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स्‍वामी प्रसाद मौर्य का इस्‍तीफा नहीं, उसमें छुपा कॉन्फिडेंस देखें… बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत

स्‍वामी प्रसाद मौर्य का इस्‍तीफा नहीं, उसमें छुपा कॉन्फिडेंस देखें… बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत
Written by नदीम | Edited by दीपक वर्मा | नवभारत टाइम्स | Updated: Jan 13, 2022, 4:40 AMउत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 (UP Election 2022) से पहले बहुत बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत मिल रहा है। अति पिछड़ी जातियों की राजनीतिक अहमियत बढ़ गई है। स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) और दारा सिंह चौहान…

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Edited by दीपक वर्मा | नवभारत टाइम्स | Updated: Jan 13, 2022, 4:40 AM

उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 (UP Election 2022) से पहले बहुत बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत मिल रहा है। अति पिछड़ी जातियों की राजनीतिक अहमियत बढ़ गई है। स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) और दारा सिंह चौहान (Dara Singh Chauhan) इसका सबूत है।

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हाइलाइट्स

  • स्‍वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान ने यूं ही नहीं दिया इस्‍तीफा
  • यूपी में अति पिछड़ी जातियां अब सियासत की ड्राइविंग सीट पर
  • अति पिछड़े वर्ग के नेता राजनीति को उंगलियों पर नचा रहे हैं
  • बीजेपी के अंदर भी योगी को चुनौती देने वाले अति पिछड़ा वर्ग से

यूपी में योगी आदित्यनाथ सरकार के वरिष्ठ मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) ने बीते मंगलवार को सरकार और पार्टी से इस्तीफा ही नहीं दिया, बल्कि यह चुनौती भी दी कि ‘जो लोग भी अपने आपको तोप समझते हैं, उनसे वह मुकाबिल होने को तैयार हैं। वह टिकट के लिए पार्टियों के पीछे नहीं भागते, बल्कि पार्टियां टिकट देने के लिए उनके पीछे भागती हैं।’ दरअसल इस इस्तीफे के सिर्फ राजनीतिक मायने नहीं हैं, बल्कि सामाजिक मायने भी हैं। यह इस्तीफा महज एक इस्तीफा नहीं है, बल्कि एक बहुत बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत भी है। यह इस्तीफा बताता है कि अति पिछड़ी जातियां सियासत की ड्राइविंग सीट पर आ चुकी हैं। उन्हें अब महज शो-पीस बनाकर नहीं रखा जा सकता। उनमें ताकत आई है और ताकत ने उनमें आत्मविश्वास पैदा किया है। वह पिछलग्गू बनकर चलने को तैयार नहीं हैं। वह बराबरी के स्तर पर बात करने की हिम्मत रखने लगे हैं। जोखिम लेने से उन्हें डर नहीं लगता। वह अपनी महत्वाकांक्षाओं का गला नहीं घोंटतीं। नई ऊंचाइयों के सपने देखना उन्होंने अपनी आदत में शुमार कर लिया है।

अगर ऐसा नहीं होता तो स्वामी प्रसाद मौर्य अपने आपको हर हाल में राजी रखते। वह मायावती को चुनौती नहीं देते। वह बीजेपी में आकर बीजेपी नेतृत्व को नहीं ललकारते। वह अपने दिल को तसल्ली देते रहते कि मंत्री तो बने ही हुए हैं, मंत्री पद के बदले जिस हाल में रखा जा रहा है, उसी में रह लिया जाए। ऐसा नहीं है कि अचानक अति पिछड़ा वर्ग की आबादी बढ़ गई है, जिसकी वजह से यह बदलाव देखने को मिल रहा है। आबादी का यह अनुपात हमेशा से रहा है, लेकिन इन जातियों ने कभी यह सोचा ही नहीं था कि सत्ता का रिमोट कंट्रोल वे भी अपने हाथ में रख सकती हैं। वे तो बड़े दलों के ‘शो-रूम’ में ‘सजावटी आइटम’ बनकर ही फूले नहीं समाती थीं।

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सिर्फ एक मौर्य नहीं
बात सिर्फ एक स्वामी प्रसाद मौर्य की नहीं है। यूपी से लेकर बिहार तक गौर कीजिए। साफ दिख रहा है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान अति पिछड़ा वर्ग इन राज्यों की सियासत की धुरी बन चुका है और उनके जरिए उभरा नेतृत्व राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है। ओमप्रकाश राजभर का ही उदाहरण ले लीजिए। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने राजभर के साथ गठबंधन किया, योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी हिस्सेदारी के लिए वह अड़ गए, झुके नहीं, सरकार से बाहर होना स्वीकार कर लिया। उस समय 2022 के तीन साल बाकी थे, लेकिन उन्होंने चुनौती स्वीकार की। संजय निषाद को ले लीजिए। बीजेपी उनकी शर्तों पर उनसे गठबंधन करने को मजबूर हुई।

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यह भी गौर कीजिए कि बीजेपी के अंदर रहकर भी अगर कोई योगी के नेतृत्व को चुनौती देता हुआ दिख रहा है तो वह भी अति पिछड़ा वर्ग से आने वाले केशव प्रसाद मौर्य ही हैं। बिहार में सन ऑफ मल्लाह के नाम से जाने जाने वाले मुकेश सहनी वहां की पॉलिटिक्स की जरूरत बन गए हैं। विधानसभा के चुनाव में आरजेडी के साथ गठबंधन की शर्तों पर जब बात नहीं बनी तो उससे अलग होने में एक मिनट की भी देर नहीं लगाई, क्योंकि उन्हें मालूम था कि किसी गठबंधन में शामिल होना उनकी मजबूरी नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेना दूसरे दलों की मजबूरी है। हुआ भी वही। बीजेपी-जेडीयू गठबंधन ने उन्हें अपने साथ लेने में देरी नहीं की। नीतीश सरकार में अब वह कैबिनेट मंत्री हैं। यूपी के चुनाव में उनकी पार्टी बीजेपी के खिलाफ ताल ठोक रही है। बीजेपी खामोश है, सिर्फ इस वजह से कि बिहार में उसे उसका साथ चाहिए। ऐसे ही उपेंद्र कुशवाहा भी जब अपनी अलग पार्टी चलाते थे, तो मोदी सरकार में वह भी मंत्री बनाए गए थे।

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बदलाव आने की वजह
90 के दशक में मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद जिस तरह की परिस्थितियां बनीं, उनमें राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर बदलाव देखने को मिले। पिछड़ा वर्ग में राजनीतिक चेतना की शु रुआत भी यहीं से मानी जाती है। लेकिन हुआ यह कि दोनों राज्यों में जो पॉलिटिकल स्पेस तैयार हुआ, उस पर यूपी में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव का कब्जा हो गया। यूपी में सामाजिक न्याय के नारे के तहत अलग-अलग वर्षों में तीन बार मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री हुए, और 2012 में उनकी जगह अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। पिछड़ा वर्ग से आने वाले कल्याण सिंह को भी सीएम बनने का मौका मिला, लेकिन वह राम मंदिर आंदोलन के रथ पर सवार होकर मुख्यमंत्री बने थे।

उधर बिहार में सन 90 से लेकर 2005 तक अलग-अलग वर्षों में लालू यादव और राबड़ी देवी ही मुख्यमंत्री बनते रहे। उसके बाद यह पद नीतीश कुमार के पास चला गया। पिछड़ा वर्ग में यादव और कुर्मी एक तरह से ‘फॉरवर्ड’ माने जाते हैं। अति पिछड़ा वर्ग के बीच यह सवाल पैदा हुआ कि उनके बीच से कोई सीएम क्यों नहीं हो सकता? यहीं से अति पिछड़ा वर्ग में आने वाली जातियों के बीच लीडरशिप खड़ी होनी शुरू हुई। ज्यादातर अति पिछड़ा वर्ग के नेताओं ने अपनी-अपनी जातियों की नुमाइंदगी करते हुए अपने दल खड़े कर लिए। पहले लीडरशिप नहीं होने से अति पिछड़ी जातियों का कोई मोलभाव नहीं हुआ करता था, लेकिन लीडरशिप खड़ी होने की वजह से उनकी राजनीतिक अहमियत बढ़ गई है और वे अब आंख में आंख डालकर बात करने की हैसियत में आ गए हैं। चुनाव के समय ये जातियां कैसे एकजुट हो रही हैं, इसका उदाहरण बुधवार को भी देखने को मिला, जब अति पिछड़ा वर्ग से आने वाले एक और मंत्री दारा सिंह चौहान ने योगी सरकार से इस्तीफा दे दिया।

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Web Title : extremely backwas castes now driving force of uttar pradesh politics see confidence of swami prasad maurya
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