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देख लीजिए नीतीश सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट, अपनी ही बनाई सड़क को क्यों काट डाला?

देख लीजिए नीतीश सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट, अपनी ही बनाई सड़क को क्यों काट डाला?
Bihar News : बिहार सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट एक बार फिर से सवालों के घेरे में है। सवाल फिर से उसी पुल के एप्रोच रोड पर उठ रहे हैं जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उद्घाटन के 29 दिनों के अंदर ही ध्वस्त हो गया।Bihar Flood : देख लीजिए नीतीश सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट, अपनी ही…

Bihar News : बिहार सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट एक बार फिर से सवालों के घेरे में है। सवाल फिर से उसी पुल के एप्रोच रोड पर उठ रहे हैं जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उद्घाटन के 29 दिनों के अंदर ही ध्वस्त हो गया।

Bihar Flood : देख लीजिए नीतीश सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट, अपनी ही बनाई सड़क को क्यों काट डाला?

Bihar Flood : देख लीजिए नीतीश सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट, अपनी ही बनाई सड़क को क्यों काट डाला?

हाइलाइट्स:

  • देख लीजिए नीतीश सरकार का बाढ़ मैनेजमेंट
  • अपनी ही बनाई सरकार को क्यों काट डाला?
  • वही सड़क जो पिछले साल उद्घाटन के महीने भर में हुई थी ध्वस्त
  • सत्तरघाट पुल की अप्रोच सड़क फिर बनाई.. बाद में तीन जगह से खुद काटा

पटना/गोपालगंज:
क्या बिहार सरकार के पास अफरात (बहुत ज्यादा) पैसे हैं? क्या नीतीश सरकार को विकास की इतनी जल्दी है कि करोड़ों रुपये खर्च करने से पहले एक सर्वे तक की जरूरत नहीं समझी जाती। क्या बिहार सरकार बगैर किसी रिसर्च और जमीनी काम के बगैर ही पुलों और अप्रोच रोड को बना डालती है? ये सवाल NBT बिहार यूं ही नहीं उठा रहा। अगर कोई सरकार बाढ़ से पहले अपनी ही बनाई सड़क को तीन जगह से काट दे और खासकर उस सड़क को जो पिछले साल उद्घाटन के 29 दिन में ही ध्वस्त हो गया। दोबारा पैसे खर्च करने के बाद अगर फिर से उसे काटा गया तो ये सारे सवाल गलत नहीं है।

सत्तरघाट के अप्रोच रोड प्रोजेक्ट में 70 छेद?
बात फिर से उसी सत्तरघाट पुल की है जिसका अप्रोच रोड जिसका उद्घाटन पिछले साल 16 जून को हुआ और महज एक महीने में ही वो ध्वस्त हो गया। बाढ़ का पानी नीतीश के इंजीनियरों की काबिलियत को चिढ़ा गया। उस वक्त सत्तरघाट प्रोजेक्ट में पूरा खर्च 325 करोड़ रुपयों का आया था। सत्तरघाट पुल की लंबाई करीब दो किलोमीटर की है और इसका अप्रोच रोड करीब 6 से 7 किलोमीटर का। यानि ऐसे समझिए कि इस अप्रोच रोड को बनाने में भी कम से कम 25 करोड़ रुपये हुए होंगे। दोबारा बनाने में भी उससे थोड़े ही कम पैसे लगे होंगे। लेकिन…

लेकिन… जी ये शब्द ‘लेकिन’ बहुत बड़े मायने रखता है इस बार। ऐसे में बाढ़ से इस बार कहीं पूरी अप्रोच रोड ही न बह जाए इसके लिए गोपालगंज में इसे तीन जगहों से काट दिया गया। जिसकी तस्वीरें आप नीचे देख सकते हैं। ये कट कोई छोटे मोटे नहीं है, हर कट कम से कम 10 मीटर का है। यानि सरकार ने अपनी ही बनाई करोड़ों की सड़क को काट दिया।

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दोबारा बनाने में तीन से चार महीने और फिर से करोड़ों का खर्च
सोचिए, आप अपने घर अंदर एक गैलरी बनवाते हैं। लेकिन आपके घर को देखकर एक अनुभवी मिस्त्री कहता है कि आपने तो गैलरी गलत जगह पर बना दी। ऐसे में तो हल्की बरसात में भी आपके कमरों में पानी घुस जाएगा। अब आपको उसी गैलरी को तुड़वाना पड़ेगा। कुछ ऐसा ही सत्तरघाट के एप्रोच रोड के साथ भी हुआ है। बेसिक्स यानि मूल बातों को देखा गया जो की एक पुल बनाने में जरूरी होती हैं। लेकिन खास जगह से जुड़ी जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया गया। मतलब बस पुल तक पहुंचने के लिए अप्रोच रोड बन जाए।
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पथ निर्माण और जल संसाधन विभाग में कई कॉर्डिनेशन नहीं?
सवाल ये भी उठता है कि इस अप्रोच रोड को बनाने में बिहार के सड़क निर्माण विभाग और जल संसाधन विभाग में कॉर्डिनेशन यानि तालमेल नहीं था? क्योंकि तालमेल होने की सूरत में ऐसा नहीं होता कि सड़क को बाढ़ निगल जाती। यानि तालमेल के अभाव ने ही करोड़ों रुपये पानी में डूबा दिए।

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सरकार को अपने ही इंजीनियरों पर भरोसा नही
ये सवाल भी बेहद अहम है। सीएम नीतीश कई मौके पर कह चुके हैं कि वो खुद इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके हैं। ऐसे में अगर बनी-बनाई सड़क को काटना पड़ रहा है तो क्या सरकार को अपने ही इंजीनियरों पर भरोसा नहीं है? अगर भरोसा होता तो शायद जरूरी पुलिया के बगैर सड़क बनाई ही नहीं जाती।

जमींदारी बांध को बचाया होता तो ये नौबत न आती
यहां एक मसला और भी है। जेडीयू के पूर्व विधायक मजीत सिंह भी इसी इलाके से आते हैं। उनकी बात भी गौर करने लायक है। मंजीत का कहना है कि कभी इस इलाके में एक जमींदार बांध हुआ करता था। धीरे-धीरे रखरखाव की कमी के चलते उसका अस्तित्व खत्म हो गया। 2008-09 के आसपास जमींदारी बांध को नए सिरे से बनाने के लिए निविदा भी जारी की गई। लेकिन आज तक उस पर काम नहीं हुआ। अगर जमींदार बांध को पुनर्जीवित कर दिया गया होता तो शायद ये समस्या ही नहीं आती और न ही वो इलाके बाढ़ में डूबते जो सड़क काटने की वजह से डूब रहे हैं। ऐसे में सरकारी खजाने पर पुलियों के अलावा बाढ़ से बचाव और राहत के अतिरिक्त खर्चे का भी भार पड़ रहा है।
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इस जमींदारी बांध को लेकर मंजीत सिंह ने विधायक रहते सदन में भी आवाज उठाई थी। लेकिन नतीजा सिफर ही रहा, इतनी कोशिशों के बाद भी जमींदारी बांध पर कोई काम नहीं हुआ।

गोपालगंज प्रशासन से NBT बिहार की टीम ने की बात
जिले के डीएम (पिछले सात सत्तरघाट अप्रोच रोड टूटने वक्त दूसरे जिलाधिकारी थे) नवल किशोर चौधरी से जब नवभारत टाइम्स बिहार की टीम ने बात की तो उन्होंने बताया कि जब पहली बार सड़क बाढ़ की भेंट चढ़ी थी तब एक टीम ने आकर यहां सर्वे किया। उन्होंने तीन जगहों की पहचान की जहां बड़े स्टेन वाली बड़ी पुलिया बनाने से सड़क पर पानी का दबाव नहीं पड़ेगा। ऐसे में उन्हीं तीन जगहों पर कट लगाए गए हैं जहां पुलिया बननी है।

करोड़ों रुपये डुबाकर खुली बुद्धि
लेकिन अब जब बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है तो पुलिया बनाने का मतलब उस पैसे को भी पानी में डूबा देना होगा। वहीं जब करोड़ों रुपयों से बनी सड़क बाढ़ की भेंट चढ़ गई तब जाकर सड़क निर्माण विभाग की बुद्धि खुली।

मुजफ्फरपुर का भी वही हाल
मुजफ्फरपुर का हाल भी जान लीजिए। यहां दो दिन पहले साहेबगंज में नेपाल से छोड़े गए पानी के चलते गंडक का पानी बढ़ा और 10 पंचायतों में पानी घुस गया। यहां तक कि मेन रोड तक पर बाढ़ का पानी आ गया। NBT मुजफ्फरपुर संवाददाता ने जब इसकी पड़ताल की तो पता चला कि बांध से पानी ओवरफ्लो कर गया। लेकिन डीएम प्रणव कुमार इसे बाढ़ मानने को तैयार ही नहीं थे। सिर्फ इतना कह रहे थे कि निचले इलाकों में जलस्तर बढ़ गया है। गोपालगंज डीएम की तरह दूरदर्शिता दिखाए जाने के बदले उल्टे वो इसे बाढ़ न साबित करने में जुट गए। ये नहीं बता पाए कि निचले इलाकों में जलस्तर अचानक बढ़ कैसे गया।

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‘बाढ़ नहीं, सरकार डुबाती है’
गोपालगंज में सत्तरघाट पुल का अप्रोच रोडहो या मुजफ्फरपुर का साहेबगंज। प्रभावित लोग तो यहां तक कहते हैं कि दशकों से उन्हें बाढ़ नहीं बल्कि सरकार डुबाती आई है। किसी सरकार ने विकास नहीं किया तो किसी ने जल्दबाजी में विकास करने के चक्कर में आंखें बंद करके तरक्की करने की कोशिश की, जिसका नतीजा आम लोगों को अब तक भुगतना पड़ रहा है।
गोपालगंज से सुनीता सिंह और मुजफ्फरपुर से संदीप कुमार के इनपुट्स

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